Salempur Live: सलेमपुर शहर की दुर्दशा पर एक सामयिक लेख का आलोचना ।
#अपना सलेमपुर शहर
" कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए "
उर्दू के प्रख्यात शायर 'दुष्यंत कुमार' का ये शेर फिलवक्त सलेमपुर की दुर्दशा पर बिल्कुल फ़िट बैठता है।
ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने की दर बढ़ाकर, अमेरिका-जर्मनी के समरूप कर दी गई है और स्टेशन रोड की सड़क की वो दशा है कि आप गढ्ढों में पानी भरके, मत्स्यपालन शुरू कर सकते हैं।
मोदी लहर में जीतकर निकले जनप्रतिनिधियों के तो क्या कहने, हमारे माननीय सांसद और विधायक जी तो पोलर बियर बन गए हैं जो केवल चुनावी मौसमों में बाहर निकलते हैं और फिर शीतनिद्रा में चले जाते हैं। हमारे जननेता; हमारे अतिप्रिय चैयरमैन साहब जो सलेमपुर को जिला बनाने निकले थे, शायद चलते-चलते युगान्डा से आगे निकल पड़े हैं क्योंकि पिछले 30 घण्टों से बिजली गुल होने के बावजूद, उन्होंने अबतक कोई पदयात्रा नहीं निकाली।
स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर एकमात्र सरकारी अस्पताल- सीएचसी सलेमपुर है; जहाँ सिवान-मैरवा भटनी और आसपास के ग्रामीण इलाकों से रोगी आते हैं और इतने आते हैं कि अस्पताल अभी खुद दम फूलने की बीमारी से ग्रस्त है और लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सहारे अपने दिन काट रहा है।
सलेमपुर में चुनिंदा ट्रेनों का ठहराव; लोकसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा था, जिसे चुनाव जीतकर आने के बाद, अगले चुनाव के लिए ठंडे बस्ते में रख दिया गया है- मानिए बीजेपी का राम मंदिर हो या फिर राहुल गांधी का जनेऊ।
बिजली विभाग के खेल से अवैध कनेक्शन का धंधा भी खूब फ़ल फूल रहा है, इसमें कोई दो राय नहीं है। ओवरलोड झेल पाने सकने में नाक़ाम ट्रांसफार्मर; हर 15 दिन के बाद दम तोड़ देता है।
फिर से उसी ट्रांसफॉर्मर को भारतीय जुगाड़ पद्धति का उपयोग करके अगले 15 दिनों तक चलाया जाता है । दूसरे ही दिन फिर कहीं तार टूट जाता है और बत्ती फिरसे 3 दिनों के लिए गुल।
अभी विजीलेंस विभाग द्वारा चलाए गए अभियान में, नगर के ₹10,000 से अधिक सभी बकायेदारों की बिजली काट दी गई लेकिन सुविधा तो वो मिलती है कि चम्बल की घाटी भी शर्मा जाए।
अभी रुकिए श्रीमान, सिर्फ शासन-प्रशासन को दोष देने भर से काम नहीं चलने वाला, ज़रा सोचिए कि आम जनता भी कितनी जागरूक है।
हर 10 में से 5 लोग तो सिर्फ़ घर में बैठकर सरकार को कोसने वाले हैं, 3 लोगों को अपनी दुकानदारी ही देखनी है और बचे 2 लोग संबंधित विभाग में पहुंचकर कौनसा कोहराम मचाएंगे, ये आप भी समझ सकते हैं।
ये ग्रामीण भारत है साहब, इसे मंदी-जीडीपी-राफेल और सार्क सम्मेलन का निचोड़ सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं है।
ये तो बस दो वक़्त की रोटी कमाकर, घर जाके चैन से सो जाना चाहता है।
कमसेकम उससे, उसका ये हक़ तो मत छीनिये।
इस पोस्ट के माध्यम से मेरा मकसद नाम कमाना नहीं है, आप चाहें तो इस पोस्ट को अपनी वॉल पर शेयर करें, कॉपी करें और अगर इच्छा हो तो मुझे क्रेडिट भी मत दीजियेगा । यद्यपि इससे बहुत कुछ बिगड़ने वाला नहीं है फिर भी ये आशा है कि ये पोस्ट लगभग हर सलमेपुर वासी के फ़ेसबुक-व्हाट्सएप पर पहुंच जाए क्योंकि सम्भव है, कोई तो अधिकारी, कोई तो जिम्मेदार अफ़सर होगा जिसके कान पर जूं रेंग जाए।
कड़वे वचन के लिए अग्रिम क्षमा। मैंने अपना काम कर दिया है, अब आपकी बारी।
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#अपना सलेमपुर शहर
" कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए "
उर्दू के प्रख्यात शायर 'दुष्यंत कुमार' का ये शेर फिलवक्त सलेमपुर की दुर्दशा पर बिल्कुल फ़िट बैठता है।
ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने की दर बढ़ाकर, अमेरिका-जर्मनी के समरूप कर दी गई है और स्टेशन रोड की सड़क की वो दशा है कि आप गढ्ढों में पानी भरके, मत्स्यपालन शुरू कर सकते हैं।
मोदी लहर में जीतकर निकले जनप्रतिनिधियों के तो क्या कहने, हमारे माननीय सांसद और विधायक जी तो पोलर बियर बन गए हैं जो केवल चुनावी मौसमों में बाहर निकलते हैं और फिर शीतनिद्रा में चले जाते हैं। हमारे जननेता; हमारे अतिप्रिय चैयरमैन साहब जो सलेमपुर को जिला बनाने निकले थे, शायद चलते-चलते युगान्डा से आगे निकल पड़े हैं क्योंकि पिछले 30 घण्टों से बिजली गुल होने के बावजूद, उन्होंने अबतक कोई पदयात्रा नहीं निकाली।
स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर एकमात्र सरकारी अस्पताल- सीएचसी सलेमपुर है; जहाँ सिवान-मैरवा भटनी और आसपास के ग्रामीण इलाकों से रोगी आते हैं और इतने आते हैं कि अस्पताल अभी खुद दम फूलने की बीमारी से ग्रस्त है और लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सहारे अपने दिन काट रहा है।
सलेमपुर में चुनिंदा ट्रेनों का ठहराव; लोकसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा था, जिसे चुनाव जीतकर आने के बाद, अगले चुनाव के लिए ठंडे बस्ते में रख दिया गया है- मानिए बीजेपी का राम मंदिर हो या फिर राहुल गांधी का जनेऊ।
बिजली विभाग के खेल से अवैध कनेक्शन का धंधा भी खूब फ़ल फूल रहा है, इसमें कोई दो राय नहीं है। ओवरलोड झेल पाने सकने में नाक़ाम ट्रांसफार्मर; हर 15 दिन के बाद दम तोड़ देता है।
फिर से उसी ट्रांसफॉर्मर को भारतीय जुगाड़ पद्धति का उपयोग करके अगले 15 दिनों तक चलाया जाता है । दूसरे ही दिन फिर कहीं तार टूट जाता है और बत्ती फिरसे 3 दिनों के लिए गुल।
अभी विजीलेंस विभाग द्वारा चलाए गए अभियान में, नगर के ₹10,000 से अधिक सभी बकायेदारों की बिजली काट दी गई लेकिन सुविधा तो वो मिलती है कि चम्बल की घाटी भी शर्मा जाए।
अभी रुकिए श्रीमान, सिर्फ शासन-प्रशासन को दोष देने भर से काम नहीं चलने वाला, ज़रा सोचिए कि आम जनता भी कितनी जागरूक है।
हर 10 में से 5 लोग तो सिर्फ़ घर में बैठकर सरकार को कोसने वाले हैं, 3 लोगों को अपनी दुकानदारी ही देखनी है और बचे 2 लोग संबंधित विभाग में पहुंचकर कौनसा कोहराम मचाएंगे, ये आप भी समझ सकते हैं।
ये ग्रामीण भारत है साहब, इसे मंदी-जीडीपी-राफेल और सार्क सम्मेलन का निचोड़ सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं है।
ये तो बस दो वक़्त की रोटी कमाकर, घर जाके चैन से सो जाना चाहता है।
कमसेकम उससे, उसका ये हक़ तो मत छीनिये।
इस पोस्ट के माध्यम से मेरा मकसद नाम कमाना नहीं है, आप चाहें तो इस पोस्ट को अपनी वॉल पर शेयर करें, कॉपी करें और अगर इच्छा हो तो मुझे क्रेडिट भी मत दीजियेगा । यद्यपि इससे बहुत कुछ बिगड़ने वाला नहीं है फिर भी ये आशा है कि ये पोस्ट लगभग हर सलमेपुर वासी के फ़ेसबुक-व्हाट्सएप पर पहुंच जाए क्योंकि सम्भव है, कोई तो अधिकारी, कोई तो जिम्मेदार अफ़सर होगा जिसके कान पर जूं रेंग जाए।
कड़वे वचन के लिए अग्रिम क्षमा। मैंने अपना काम कर दिया है, अब आपकी बारी।
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- Credit Goes to Mr. Satyadeep Trivedi

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